चाँद बावड़ी- एक स्वर्णिम अतीत जिस पर इतिहास लगभग मौन हैं

प्राचीन भारत के इतिहास के प्रतीकों के प्रति मेरा खास लगाव रहा है। एक ऐसा ही प्रतीक राजस्थान के जिले दौसा में स्थित आभानेरी गांव की विश्व की विशालतम स्टेपवैल चाँद बावड़ी है (Step-Well: राजस्थानी भाषा में जिसे बावड़ी कहते हैं)। आज हम चाँद बावड़ी का यात्रा करते हैं। अनेक सवालों के साथ, जयपुर से रोडवेज बस में यात्रा की शुरुआत होती है। यात्रियों से खचाखच भरी बस, राष्ट्रीय राजमार्ग-11 पर सरपट दौड़ते बस तकरीबन 01.40 घंटे में सिकंदरा टोल प्लाजा पहुँचती है। यहां से सिकंदरा चौराया तक सड़क के दोनों ओर पत्थर तराशने का काम अनायश ही ध्यान खींचता है। सिकंदरा दुनियाभर में पत्थर पर नक्काशी के लिए मशहूर है। सिकंदरा उतरकर आगे का रास्ता पता किया, तो मालूम हुआ यहां से लोकल टैक्सी आभानेरी जाती है। ये लोकल टैक्सी ओवरलोडेड होती है। जिनमें ठूस के बैठना होता है। टैक्सी जगह जगह रुकती चलती है। 10 किमी का सफर 30-40 मिनट में तय करते हुए, टैक्सी मुझे बावड़ी के एकदम पास उतार देती है।

अब हम हरे खेतों के बीच शोरगुल से दूर बसे आभानेरी गांव में हैं। आज अलसाई सी सर्दी की धूप है, सूरज सिर के ऊपर मंडरा रहा है। पास ही टी-स्टॉल है। पहले यहां चाय पीने का मन हैं, सुस्ती सी हट जाएगी। यहां कुछ ग्रामीणों बैठे बतिया रहे हैं। मैंने चाय का इशारा किया। तभी उन लोगों मुझे घूर के देखा। चाय का घूँट लेते-लेते मैंने भी जानकारी जुटाना शुरू कर दिया। एक बुजुर्ग आदमी ने कहा कि इसका निर्माण जिंनों (भूतों) ने एक रात में किया हैं। इस बावड़ी के साथ उसी रात में दौसा में स्थित दो अन्य भांडारेज व आलूदा की बावड़ियों का निर्माण भी हुआ। महान संरचनाओं के निर्माताओं का जब इतिहास धुंधला हो और आज के समय में इन्हें बनाना असंभव कार्य लगे तो लोक-मान्यताओं में इन्हें भूतों/जिन्नों की कहानियों से बातों से जोड़ दिया जाता हैं. कालान्तर में यहीं सच माना जाने लगता हैं. और उस बुजुर्ग की मान्यता में मुझे गहरा विश्वास नजर आया। हालाँकि बावड़ी को देखने के बाद मैं भी अभिभूत रहा गया, यह इंसानों का काम तो नही हो सकता। चाय का गिलास खाली हो चुका था, टी-स्टाल से थोड़ा आगे बढ़ा ही था किसी ने बताया कि यही चांद बावड़ी हैं।

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सड़क से लगते ही एक कम ऊँचाई वाली दीवार बनी हैं। संकरे से गेट से आगे बढ़ा, बावड़ी की चार दिवारी में प्रवेश करने लिए मुख्य दरवाजा हैं, जो आगे दो तरफ निकलता हैं। तभी मैंने खुद को एक अलग जगह पर पाया। 3500 सीढ़ियों की भूल-भुलैया नीचे की तरफ छोटे तालाब की और उतरती हैं।

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पूरे काम्प्लेक्स चांदनी रात जैसी दुधिया रोशनी सा चमकता हैं, हवा का झोंका शीतलता को महसूस करवाता हैं। यह स्मारक भारत के उतार-चढाओं युक्त इतिहास साक्षी रहा हैं। इसका निर्माण निकुम्भ राजवंश के राजा चाँद या चन्द्र ने करवाया था। जो 8वीं – 9वीं शती ईस्वी में आभानेरी या प्राचीन आभानगरी पर शासन करता था। 19.5 मीटर गहरी यह बावड़ी योजना में वर्गाकार हैं तथा इसका प्रवेशद्वार उतर की और हैं। नीचे उतरने के लिए इसमें तीन तरफ से दोहरे सोपान की व्यवस्था हैं जबकि उत्तरी भाग में स्तंभों पर आधारित एक बहुमंजिली दीर्घा बनाई गई हैं। इस दीर्घा से प्रक्षेपित दो मंडपों में महिषासुरमर्दिनी एवं गणेश की सुन्दर प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं.

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बावड़ी का प्राकार, पार्श्व बरामदे एवं प्रवेशमंडप मूल योजना में नहीं बने थे और इनका निर्माण बाद मुग़ल काल में किया गया।

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हर्षद माता मंदिर

पास ही स्थित हर्षद माता का एक जीर्ण-शीर्ण सा मंदिर हैं। जिसे प्राचीन आभानेर नगर में हर्ष (खुशी) की देवी माना हैं। इस विशाल मंदिर का निर्माण भी राजा चाँद या चन्द्र करवाया था। महामेरु शैली का यह पूर्व की और देखता हुआ मंदिर दोहरे ऊंचे प्लेटफार्म पर स्थित हैं। मंदिर गर्भगृह योजना में प्रदक्षिणापथ युक्त, पंचरथ हैं जिसके अग्रभाग में स्तंभों पर आधारित मंडप हैं। गर्भगृह एवं मंडप गुम्बदाकार छातायुक्त हैं

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(श्रद्धालु मंदिर में पूजा करते हुए)

मंदिर में स्थापित वर्तमान मूर्ति, 1968 में तस्करों द्वारा चोरी की हर्षत माता की नीलम धातु की मुख्य मूर्ति के बाद स्थापित की गई हैं। बहुमूल्य धातु की अन्य मूर्तियां भी यहां से चोरी की गई।

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जीर्णोद्धार के बाद बनाया गुम्बद जो अपने प्राचीन वैभव को हासिल नही कर पाया।

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मंदिर की बाहरी दीवार पर भद्र-ताखों में ब्राह्मण देवी-देवताओं की प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं। ऊपरी प्लेटफार्म के चहरों और ताखों में रखी सुन्दर मूर्तियाँ जीवन के धार्मिक एवं कौकिक दृश्यों को दर्शाती हैं।

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(भगवान शिव पार्वती के साथ बैठे हैं)

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(दुष्ट आत्माओं का संहार करते हुए) (कामसूत्र के प्रमाण भी यहां मिलते हैं)

आभानेर से प्राप्त महत्वपूर्ण मूर्तियां (8वीं सदी)

काफी छानबीन के बाद मुझे पता चला की कुछ महत्वपूर्ण मूर्तियाँ अल्बर्ट हॉल म्यूजियम, जयपुर में रखवाई गई हैं। वहां से लिये कुछ फोटो निम्न है-

मातृका पट्ट (अल्बर्ट हॉल म्यूजियम, जयपुर)

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बलुए पत्थर में बना सप्तपात्रिका पट्ट जिसमें वीनाधारी वीरभद्र (शिव का प्रतिरूप) के साथ सप्तमातृकाएं बनी हैं. मातृकाओं में माहेश्वरी, वैष्णवी, वाराही कौमारी, इन्द्राणी एवं चामुंडा हैं जबकि ब्राह्मणी फलक में मौजूद नहीं है. मार्कंडेय पुराण के दुर्गा सप्तशती प्रकरण मेबं प्रमुख शक्ति रूपों की चर्चा हुई हैं, जिनका प्राकट्य महिषासुर वध के लिए होता हैं. भारतीय मूर्तिकला में, 7वीं-13वीं शती के बीच जब देश में तंत्र पूजा की लोकप्रियता बढ़ी तो ऐसी मूर्तियाँ बड़ी संख्या में बनी.

कार्तिकेय -(अल्बर्ट हॉल म्यूजियम, जयपुर)

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शिवपुत्र कार्तिकेय देवताओं की सेना के नायक हैं, मंगल ग्रह से इनका संबंध हैं

रावणानुग्रह मूर्ति -(अल्बर्ट हॉल म्यूजियम, जयपुर)

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रावण, कैलाश पर्वत उठाने का प्रयास करते हुए जिस पर शिव – पार्वती विराजमान हैं।

महिषासुर मर्दिनी -(अल्बर्ट हॉल म्यूजियम, जयपुर)

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इस मूर्ति में देवी महिषासुर नामक राक्षस का वध करते हुए।

आभानेरी का वास्तविक संस्थापक कौन था?

आभानेरी के बारे में लिखित दस्तावेज लगभग अनुपलब्ध हैं। एक अभिलेख के हवाले से बताया हैं कि चांद बावड़ी और हर्षत माता मंदिर का निर्माता राजा चंद्र को हैं जो निकुम्भ शासक था। इतनी महान स्थापत्य संरचना के लिए लंबे समय तक शासन होना चाहिए। जो आर्थिक एवं सैन्य रूप से मजबूत हो। परन्तु उस समय दौसा के इस भू-भाग पर गुर्जर प्रतिहार वंश का शासक सम्राट मिहिर भोज का शासन था। कुछ इतिहासकारों ने मिहिर भोज को ही राजा चन्द्र कहा हैं। जो अधिक तार्किक व सत्य प्रतीत होता हैं।

महमूद गजनवी ही हर्षद माता मंदिर का विध्वंशक था?

इस भव्य मन्दिर को विदेशी लूटेरे महमूद गजनवी (सन 1021-26) ने तहस-नहस किया था। यहां हजारों खंडित मूर्तियां इस बात का साक्षी है। बाद में स्थानीय लोगों ने पत्थरों को पुनः जोड़कर इसका निर्माण कराया। आभानेरी प्राचीन आगरा – अजमेर मार्ग पर स्थित हैं। जो मुग़लों के लिए आम रास्ता था। इसलिए मुग़लों में बावड़ी के चारों ओर बरामदेनुमा आरामगाह का निर्माण करवाया।

बावड़ी की स्थानीय जीवन में क्या महत्व था?

स्थानीय लोग मंदिर में पूजा के दौरान चाँद बावड़ी में स्नान करते हैं। बावड़ी में स्नान करना पवित्र माना जाता हैं। यानी धार्मिक संस्कारों के निर्वाह में बावड़ी में स्नान को आवश्यक माना हैं। बावड़ी के पैंदे में देवताओं की मूर्ति भी इस क्रम में स्थापित की गई थी।

यह क्षेत्र शुष्क जलवायु में आता हैं। वर्षा जल संरक्षण के लिए भी इसका निर्माण हुआ हैं। ताकि पीने के लिए भी इसके जल का इस्तेमाल होता रहे। उल्लेखनीय हैं कि यह बावड़ी बाणगंगा नदी से 2 किमी दूर हैं। जो दिखाता हैं कि हमारे पूर्वज जल संरक्षण के प्रति कितनी सजग थे।

हॉलीवुड और बॉलीवुड में चाँद बावड़ी?

The Fall: http://www.youtube.com/watch?v=I2G9odRLhuE

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Bhoomi: Climax Scene

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The Dark Knight Rise: https://www.youtube.com/watch?v=8GRIy1W5_gQ

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Bhul Bhulaiyya: Song http://www.youtube.com/watch?v=kUFZWuOq3nk

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वापसी में सिकंदरा के पत्थर तराशों के प्रति में मन सम्मान से बढ़ गया, उन्होंने अपनी विरासत को जी तोड़ मेहनत से आगे बढ़ाया हैं। सुखद यादों के साथ भारतीय इतिहास के स्वर्णिम झरोखे से गुजरने का एहसास लिए मैं पुनः लौट आया।

चाँद बावड़ी कैसे पहुँचा जाएँ?

जयपुर – आभानेरी के बीच दूरी लगभग 95 किमी हैं जिसे 2 घंटे में तय किया जा सकता हैं। यहाँ से निकटवर्ती रेल्वे स्टेशन बांदीकुई 6 किमी हैं जो जयपुर-दिल्ली रेलवे लाइन पर स्थित हैं।

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