शिलांग से तुरा की यात्रा

        मैं गुवाहाटी से शिलांग 04 मार्च, 2018 को पंहुचा था। वहां से अगले दिन मावफलांग पहुँचा। मावफलांग से मधुर यादों के साथ 06 मार्च, 2018 की दोपहर में नोकरेक नेशनल पार्क के लिए रवाना हो गया। मावफलांग से चार किलोमीटर चलने पर मावंलाप गाँव आता है, यही से शिलांग से नोंगस्टोइन को जोड़ने वाला  NH-106 मिलता है। यह डबल लेन हाईवे मेघालय को समानांतर रूप से दो भागों में बांटते चलता है।  मावफलांग से निकल कर माईरंग – किनशी – नोंगशिलांग- सोहपियान – नोंगस्टोइन – शालांग – रोंगजेंग – सोंगसक – रोंगरेंगरे जैसे छोटे -बड़े गाँव-नगरों से परिचय होता गया।

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सोहिओंग

मेघालय में एक अलग ही भारत बसता है, जो सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से अद्वितीय  है। पूर्व से पश्चिम मेघालय की तरफ जाने पर जयंतिया से खासी व खासी से गारो हिल्स में प्रवेश करते है। इन पहाड़ियों के नाम के साथ यहां की जनजातियां का भूगोल भी बदलता जाता है।

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माईरांग से किन्शी के रास्ते में किन्शी नदी, NH-106 के साथ साथ चलती जाती है

     मेघालय मनोरम राज्य है, यहाँ हर पल नया खूबसूरत दृश्य हमारे सामने होता हैं, जैसे हिंदी फिल्म के गाने में सुन्दर फ्रेम तेजी से बदल रहे हो। इन मनोरम दृश्यों का मजे लेने में  यहाँ  मौसम भी सहयोगी बनता है। न तो ज्यादा गर्मी ही और न ही ज्यादा सर्दी महसूस होती है। उत्तर भारत के उलट यहाँ पर्यावरण प्रदूषण नहीं है। इसलिए आपको थकान भी तुलनात्मक रूप से कम होती हैं। अप्रैल से सितम्बर महीने के बीच कब वर्षा शुरू हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता है। पठारी भूभाग होने के कारण समतल मैदान काम है, इसीलिए यहाँ ड्रेनेज सिस्टम बहुत तेज हैं। समतल मैदानों के अभाव के कारण सड़क पहाड़ के गिरिपाद में चलती रहती है। दो पहाड़ों के बीच बनी घाटी में नदी और सड़क एक दुसरे के हमसफ़र होते हैं। कहीं कहीं इन्हीं नदी घाटियों के किनारे को जोड़ने के लिए नदी के आर-पार सस्पेंशन पुलिया बनी होती हैं। बीच – बीच में छोटे-छोटे गाँव आते हैं, जो अमुमन दूर दूर होते हैं। गाँवों में जनसंख्या कम हैं। इन गाँवों का बाहरी दुनिया से सीमित संपर्क हैं। इसलिए यहाँ बाहरी सैलानियों को कौतूहलवश देखा जाता हैं। परदेशियों के बारे में यहां के जन-मानस में अनेक पूर्वाग्रही कहानियां हैं। जब मैं बताता कि मैं राजस्थान से आया हूँ लोग अचम्भित रह जाते।

उत्तर भारत के उलट यहां सड़क किनारे इक्का दुक्का ढाबा ही होता हैं। सामान्यता यहां साप्ताहिक हाट बाजार लगते हैं। बाकी दिनों दुकाने बंद रहती हैं। शेष भारत की तरह यहाँ रोजमर्रा की भागदौड़ नहीं हैं। भौतिकवाद हावी नहीं हुआ हैं। आधुनिक संसाधन हैं तो सही लेकिन उनको अभी लोगों की जिंदगी में आने में वक़्त लगेगा। यहाँ की फिजाओं में अपनापन  महसूस किया जा सकता है।

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नांगस्टॉइन के समीप उमलंगखर रेंज की पहाड़ियां जिन पर मानसून में हरित चादर बिछी रहती है
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नांगस्टॉइन की तरफ बढ़ते हुए
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शालांग के रास्ते में एक छोटी सी झील
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रोंगजेन्ग के रास्ते में ग्रामीण महिलाएं ईंधन के लिए लकड़ियां घर ले जाती हुई
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ग्रामीण क्षेत्रों में साप्ताहिक हाट बाजार लगते है, यहाँ पर आसपास के लोग जरुरी सामान खरीदने-बेचने आते है
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मेघालय में धान की खेती की जाती है धान फरवरी के अंत तक काट लिया जाता है। स्थानीय लोग धान से अनेक तरह के पेय पदार्थ बनाते है।

     अब चलते-चलते मुझे इस  खूबसूरत रास्ते से लगाव सा हो गया है। ख़्वाब बुनते-बुनते विलियम नगर पहुँच गया। गूगल मैप से रास्ता देखता हुआ चल रहा था। सोंगसक-रोंगरेंगरे के जंगल से निकल रहे हाईवे के दोनों तरफ घना जंगल है, इस हाईवे की खूबसूरती विस्मयकारी है।

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सोंगसक के रास्ते से मनोरम दृश्य

       मैं यहाँ इस पर कदर खोया था कि मोबाइल में रास्ते के लिए जीपीएस देखने में भी आलस्य आ रहा था। विलियम नगर के पास स्थित समंदा बाजार जंक्शन से सीधा ही हाईवे पर चलता रहा। करीब 30 किमी नॉन स्टॉप चलने के बाद ओरगिटोक गाँव (नोकरेक जाने का मोड़) नहीं आया, तो मुझे संदेह हुआ। मैप देखने पर पता चला मैं रास्ता भटक चुका था। दरअसल हुआ यूँ कि समंदा से तुरा के लिए दो रास्ते हैं एक सीधा असनांग – रोंगराम – तुरा, दूसरा जेंगजाल -असनांग- रोंगराम -तुरा। गूगल मैप दूसरे रास्ते को नहीं दिखाता है क्योकि यह नवनिर्मित हाईवे हैं जिसका हाल ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ही उद्घाटन किया था। इसलिए मैं समन्दा बाजार जंक्शन से जेंगजाल की तरफ भूलवश चला गया। अब नोकरेक (दरिबोकगरे) वापस यू-टर्न  लेकर जाना होगा। लेकिन सूरज की रौशनी कम हो रही थी। तो मैं इसी रास्ते पर चलता रहा, और अब तय हुआ कि तुरा में रात्रि विश्राम किया जायेगा। आज पहली बार मुझे रास्ता भटकने का मलाल नहीं था। बल्कि मन आज स्वछंद विचरण कर रहा था। जेंगजाल के बाद असनांग पहुँचते-पहुँचते शाम हो चुकी थी।

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सोंगसक का जंगल

जब मैं तुरा पहुंचा तो 7 बज चुके थे, रात हो चुकी थी। शहर में  बिजली गुल थी, इसलिए बाज़ार में अंधेरा पसरा हुआ था। दुकानें बंद हो रही थी। लोग जल्दी-जल्दी सब्ज़ियाँ ख़रीद रहे थे। हथियारबंद पुलिस गश्त लगा रही थी। यह मुझे असामान्य लगा। जब तुरा आ रहा था तो कई जगह दीवारों पर गारोलैंड के समर्थन में स्लोगन लिखे हुए थे। दरअसल मेघालय का एकमात्र विद्रोही संगठन “गारो नेशनल लिबरेशन आर्मी” काफी अरसे से गारो हिल्स के लिए गारोलैंड की मांग करता है। मेघालय में विधानसभा चुनावों के दौरान उसने अपनी मांग को तेज कर दिया। इसलिए पुलिस चौकसी ज्यादा थी। अब एक सस्ता और अच्छा होटल ढूंढना एक चुनौती से कम नही था। जब होटल ढूँढने के लिए निकला तो शिलांग की तरह ही तुरा के ट्रैफिक में चकरा गया। यहां भी प्रमुख सिटी मार्ग वन-वे होते हैं। उस रात मैं इस नए शहर के वन-वे रास्तों में गोल-गोल चक्कर लगा रहा था। एक अपरिचित के लिए गूगल मैप के बिना सही जगह तक पहुँचना काफी मुश्किल है। अंत में एक युवक ने राजकमल होटल का सुझाव दिया। होटल मुख्य बाजार के पास ही था। जिससे तुरा शहर का रात्रि दृश्य दिखता है। यहां सिंगल रूम ₹400 का मिला। होटल में अच्छी बात हैं कि यहाँ का रेस्टोरेंट मेनू में उत्तर भारतीय खाना भी मिलता हैं। बाइक से आज मैंने तकरीबन 300 किमी दूरी तय की, फिर ज्यादा थकान नही है। आगे यहीं से सुबह नोकरेक के लिए रवाना होना है।

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