नोकरेक से सिजु की यात्रा

नोकरेक नेशनल पार्क (दरिबोकगरे) से मार्च की इस दोपहरी में मेघालय यात्रा के अगले पड़ाव सिजु के लिए रवाना हो गया। दरिबोकगरे संपर्क सड़क ओरगिटोक में तुरा-विलियम नगर मार्ग के जुड़ जाती है। ओरगिटोक से आगे यह मार्ग सिमसांग नदी के साथ-साथ चलता है। सिमसांग का उद्गम  नोकरेक की पहाड़ियों से हैं। सिमसांग खूबसूरत घूमावदार मार्ग में चलती है व गारो पहाड़ी को दो भागों में बांटती है। यह मार्ग में मनोरम वादियों व झरनों का निर्माण करती है।

विलियम नगर के आसपास

इसी नदी के किनारे बसाया गया है पूर्व गारो हिल जिले का मुख्यालय विलियम नगर। इस जगह का इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। सन 1835 में, अंग्रेजों ने जयंतिया साम्राज्य पर विजय प्राप्त की। कुछ समय बाद खासी भी उनके अधीन थे। जोवाई में दिसम्बर 1862 में  यू किआंग नांगबा के नेतृत्व में हुए जयंतिया विद्रोह को ब्रिटिश द्वारा कुचल दिया। अब ब्रिटिश गारो हिल्स में अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते थे। इसी क्रम में सन 1872 की सर्दियों में, अंग्रेजों ने गारो हिल्स में अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए बटालियनों को भेजा। ब्रिटिश आर्मी ने तीन दिशाओं – दक्षिण, पूर्व और पश्चिम से गारो पहाड़ी पर हमला बोल दिया। गारो योद्धाओं ने भाले, तलवारें और ढालों के साथ रोंगरंगरे व सिमसांगरे के मैदानों में ब्रिटिश आर्मी का सामना किया। यह एक निर्णायक लेकिन बेमेल लड़ाई थी। क्योंकि एक तरफ परम्परागत हथियारों युक्त गारो लड़ाके थे वहीं दूसरी तरफ बंदूकों व मोर्टार वाली ब्रिटिश सेना थी। टोगन संगमा नामक साहसी नायक ने गारो योद्धाओं को एकत्रित किया और लड़ाई की बागडोर अपने हाथों में ली। दिसंबर 1872 में टोगन संगमा अपने साथियों के साथ बेजोड़ वीरता और अदम्य साहस के साथ लड़ता हुए मातृभूमि के लिए शहीद हो गया। ब्रिटिश भारत में गारो, खासी एवं जयंतिया आदिवासियों का यह पहाड़ी भू-भाग प्रशासनिक रूप से असम राज्य में मिला लिया गया।

भारत की स्वतंत्रता के बाद 1960 के दशक में गारो, खासी एवं जयंतिया पहाड़ियों से अलग-अलग राज्यों की मांग के लिए आंदोलन उठ खड़ा हुआ। इसी मांग को पूरा करने के लिए भारत सरकार ने 1970 में इसे अर्ध-राज्य का दर्जा दिया। जिसे 1972 में पूर्ण राज्य बना दिया गया। कैप्टन विलियमसन संगमा मेघालय के प्रथम मुख्यमंत्री चुने गए। उन्होंने 1976 में प्रशासन को लोगों के करीब लाने के लिए पूर्वी गारो हिल्स जिले का गठन करवाया। इसके मुख्यालय के लिए सिमसांग नदी के तट स्थित पूर्ववर्ती गाँव सिमसांगरे के मैदानों पर (जहाँ टोगन संगमा ने अग्रेजों से लड़ाई लड़ी थी) एक नियोजित शहर बसाने का फैसला हुआ। बाद में कैप्टन विलियमसन संगमा के सम्मान में ही इसका नाम विलियम नगर कर दिया।

सिमसांग नदी

मेघालय की यात्रा का सफ़र विलियम नगर तक आरामदेह था। इसके बाद आगे का सफर NH-217 से तय करना होता है। 345 किमी लम्बा यह राजमार्ग गारो हिल्स में चतुर्भुज आकृति बनाता है।

विलियमनगर के आगे नेंगखरा से  ट्रकों की कतार दिखाई देने लग गई। सड़क के किनारे सैकड़ों की संख्या में ट्रक खड़े थे। ऐसी कोई जगह खाली नहीं थी जहाँ ट्रक पार्किंग न हो। कुछ ट्रक खाली चल रहे थे, कइयों में कुछ सामान जा रहा था, जो तिरपाल से ढका हुआ था। ऐसा लग रहा था कि मैं NH-217 के स्थान पर किसी खतरनाक सड़क पर आ गया था। यह धूल भरी एक कच्ची सड़क जैसी थी। जिसमें गहरे गड्डे थे। कई जगह पानी व कीचड़ के कारण फिसलन  थी। जब कोई वाहन गुजरता तो वह धूल का गुबार अपने पीछे छोड़ जाता। जूते काली मिट्टी में पूरे धस जाते थे। यहाँ बाइक चलना बेहद जोख़िम भरा था। यह ऑफ-रोड ड्राइविंग जैसा था। मैं कुछ देर चलता रहा। अब मुझे संदेह होने लगा कहीं मैं गलत मार्ग पर तो नहीं आ गया। जीपीएस ने भी लोकेशन एन.एच. 217 ही बताई। मेरा मन हुआ क्यों न किसी से पूछ लिया जाए कि आखिर माजरा क्या है। मन में अनेक सवाल कुलबुला रहे थे, यह सड़क कहाँ से अच्छी मिलेगी? और जिज्ञासा थी कि ये ट्रकों का जंजाल क्यों लगा हैं? ये क्या सामना ले जा रहे हैं? कुछ देर मैं सोचता रहा शायद ये यह सड़क खराब हो चुकी हैं इसे बनाने के लिए सामान ले जा रहे होंगे?

सिजु के मार्ग में

अब मैं निराश हो चुका था। बाइक के साथ लगेज व मेरे कपड़े सब धूल से सन चुके थे। गुस्सा भी आने लगा था, लेकिन मैं रुका नहीं। लगातार चलता रहा।  मेरे मन की जिज्ञासाएं भी दौड़ रही थी। रास्ते में कई ट्रक ख़राब पड़े थे। कुछ नीचे गड्डे में भी जा गिरे थे। आज मुझे भारत के विकास का दावा खोखला लग रहा था। मैं स्थानीय लोगों की अभावों युक्त जिंदगी और दुःखों को महसूस कर रहा था।

भले ही सड़क की दशा आपको निराश करें, लेकिन प्रकृति के मन-मोहक नज़ारे दिल को छू लेने वाले हैं। जो आपको मंज़िल की तरफ खींचते हैं। सीजू के पास आते-आते साँझ ढलने लगी थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो आसमान कतरा-कतरा पिघल कर नदी में गिर रहा हो। सिमसांग आश्चर्यजनक रूप से सिजु के पास दो भागों में बँट जाती है। इसकी एक धारा सिजु बर्ड सैंक्चुअरी की सीमा पर सोमेश्वरी के नाम से बहती हुई बाघमारा से बांग्लादेश जाती है। दूसरी धारा गोनेश्वरी के नाम से बालपक्रम नेशनल पार्क से बांग्लादेश में जाती है। सीजू  गाँव यहाँ स्थित गुफा और बर्ड सैंक्चुअरी के लिए प्रसिद्ध है।

सिजु [फोटो: tripadvisor.in Jitesh J
अंत में, नेंगखरा से 36 किलोमीटर के लिए दो घंटे चलने के बाद मेरी आंखे चमक उठी।  सड़क पर सिजु गाँव का बोर्ड लगा था। यहीं पर बैठे दो युवकों से मेरी मुलाकात हुई जिसमे से एक मोइन आर मारक था। मोईन मुझे गुफा तक ले गया, जो हाईवे से 3-4 किमी दूर है। गोधूलि का समय हो गया था इसलिए हमने अंदर प्रवेश नहीं किया। फिर वही चाय-बिस्कुट खाये। गुफा के ही पास स्थित है वन विभाग  का आईबी (इंस्पेक्शन बंगला)। मोईन ने फॉरेस्ट बीट ऑफिसर से मिलकर रुकने की व्यवस्था करवा दी। फिर वह मुझे छोड़कर अपने घर चला गया। वह बहुत मददगार था, मैंने उसे पैसे देने की पेशकश की लेकिन उसने मना कर दिया। आईबी में खाने की व्यवस्था खुद करनी होती है, हालांकि रसोइया मिल जाता है।

अब सोने की का मन हो रहा था तभी घर पर बात करने के लिए मोबाइल देखा तो सिग्नल आ रहे थे, लेकिन इंटरनेट नहीं था। तो मोबाइल री-स्टार्ट करके देखा लेकिन इसबार नेटवर्क गायब था। मैंने नेटवर्क के बारे में पूछा तो मालूम हुआ यहाँ से 5 किमी दूर नेटवर्क आता है। रात हो चुकी थी। अब घर पर बात करना भी जरूरी था, मैंने बीट ऑफिसर को यह बात बताई तो उन्होंने एक फॉरेस्ट गार्ड को साथ सिग्नल वाली जगह मेरे साथ भेज दिया। काफी दूर चलने के बाद हम एक जगह पर रुके, वहाँ ओर भी कई लोग बात कर रहे थे। कुछ फ़ेसबुक-व्हाट्सप्प चला रहे थे। दरअसल यह मोबाइल सिग्नल जंक्शन है यहाँ पर आसपास के ग्रामीण लोग आकर फोन से बात करते हैं।

हम पुनः आईबी लौट आए। मैंने आग्रह पर बीट ऑफिसर ने एक फॉरेस्ट गार्ड को अगले दिन मेरे लिए गाइड का इंतजाम करवा दिया। सुबह पहले हम सिजु पक्षी अभयारण्य जाएंगे,  उसके उपरांत सिजु गुफाएँ देखेंगे। आज बेहद चुनौती पूर्ण दिन था और अब मैं बेहद थका हुआ था, बिस्तर पर लेटते ही नींद आ गई।

1 thought on “नोकरेक से सिजु की यात्रा”

  1. बहुत अच्छा लिखा भाई
    प्रकृति के प्रति कितना प्यार है वो एक-एक शब्दों में झलक रहा है …👌👌👌👌

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