सिजु पक्षी अभ्यारण्य – मेघालय

साउथ गारो हिल जिला, मेघालय

8 मार्च, 2018 

सुबह की आहट पाकर पक्षियों की चहचहाहट शुरू हो गई थी, इसी से मेरी नींद टूट गई। मैं गेस्ट हाउस के कमरे से बाहर निकल कर बेंच पर बैठ गया। मेरे एक तरफ जंगल है और दूसरी तरफ सोमेश्वरी नदी बह रही है। आधुनिक शोर-शराबे से दूर प्रकृति की गोद में बसे इस छोटे से गाँव की सुंदरता बेहद आकर्षक है। नदी की तरफ से शीतल समीर आ रही है, जो पेड़ों के पत्तों से टकरा रही है। इसी से एक संगीत निकल रहा है, ऐसा प्रतीत होता है मानो पक्षी इसको सुर दे रहे हैं। जैसे राग ललित की धुन सुबह के आनंद को चरम पर ले जा रही  है। इस नई सुबह के इंतज़ार में धरती ने जैसे अपनी बाहें फैला दी हों। कुछ ही मिनट में सूर्य की किरणों से सोमेश्वरी की धारा दर्पण की तरह चमकने लगी। नदी का चौड़ा तट, समुद्र के ‘बीच’ जैसा एहसास देता है। इसके दोनों तटों को जोड़ने के लिए हैंगिंग ब्रिज बनाया है। थोड़ी देर में जल-पान करके हम इसी ब्रिज से पक्षी अभ्यारण्य की ट्रेकिंग पर जाएंगे।

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ऊपरी और निचले सिजु गाँव को जोड़ने के लिए सोमेश्वरी नदी पर निर्मित हैंगिंग ब्रिज

मैं और दो वन-रक्षक (फॉरेस्ट गार्ड) 7 बजे ट्रेकिंग के लिए तैयार थे। ट्रेक की एक तरफ से लंबाई 4कि॰मी॰ है। यह ट्रेक पक्षी अभ्यारण्य के बीच में स्थित एक झील तक जाता है।  हम सोमेश्वरी पर बने हैंगिंग ब्रिज को पार करते हैं। यह ब्रिज लोअर और अपर सिजु गाँव को जोड़ता है। इसी ब्रिज से स्थानीय लोग सुपारी और तेजपत्ता जैसे कृषि उत्पाद को मोटरसाइकिल और साइकिल से मुख्य मार्ग तक ले जाते हैं, जो आगे बड़े वाहनों के द्वारा गुवाहाटी के बाज़ार में जाता है।  

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सोमेश्वरी नदी के दूसरे छोर पर

हम ब्रिज पार करके सोमेश्वरी के किनारे किनारे चलने लगते हैं। यहाँ नदी मोड़ लेती है जिससे एक खूबसूरत नज़ारा देखने को मिलता है। अब तक हम 25 मिनट चल चुके हैं, नदी के किनारे को छोड़ कर दक्षिण-पूर्व दिशा की तरफ बढ़ने लगे। अब सामुदायिक वन की सीमा भी समाप्त हो गई। हम पक्षी अभ्यारण्य के सघन वन के अंदर हैं। ट्रेक का कोई तय रास्ता नहीं है। पेड़ों से लिपटी लताएँ रास्ते के अवरोधक का काम कर रही हैं। इन्हें गाइड ‘कुफ़री’ नामक चाकू जैसे हथियार से काटते जाते और रास्ता बनाते जाते। हम थोड़ा आगे बढ़े ही थे, अचानक से ट्रेक का रास्ता  गहरी खाइयों के बीच से गुजरने लगता है। इनकी गहराई 15-25 फीट है। लाइम-स्टोन से बने स्तम्भनुमा चट्टानें ट्रेक को बेहद रोमांचक बना देती हैं। ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी हॉलीवुड फिल्म के सीन में चल रहा हूँ।

limestone.jpegलाइम-स्टोन की रोमांचक खाई से होकर ट्रेक का रास्ता जाता है

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लाइम-स्टोन की खाई से जा रहे ट्रेक में गाइड के साथ, गाइड के हाथ में कुफ़री है। इसे  जंगल में रास्ता बनाने के काम लिया जाता है। जंगली जानवरों के हमले की स्थिति में भी यह मददगार होती है।

कुछ मिनट बाद हम फिर से समतल जंगल में हैं, अब थोड़ी चढ़ाई भी आ रही है। रास्ते में हाथियों का गोबर पड़ा हुआ है, कोई झुंड यहाँ से गुजरा होगा। हाथियों के द्वारा नष्ट किए गए पेड़ भी बिखरे पड़े थे। नाना प्रकार की पक्षियों की विस्मयकारी आवाज़ें आ रही हैं। अनेक प्रकार के कीट पतंगें रास्ते में आ-जा रहे थे। मुख्य तौर से तितलियों की रंगबिरंगी दुनिया बेहद आकर्षित करती है। भँवरों की गुंजन भी है तो झींगुर की आवाज कभी कभी अकेले आदमी को डरा भी देती है। जंगल में बसंत ऋतु के आगमन के संकेत मिल रहे हैं। ऑर्किड्स के रंगीन फूल रास्ते में महक रहे हैं। पेड़ों से गिर रहे सूखे पत्ते पूरे जंगल में मोटी परत बना चुके हैं। इन पत्तों से कदमों की आवाज दूर तक जाती है, जिससे पक्षी कैमरे की नजर में आने से पहले ही ओझल हो जाते हैं। यहाँ पर किंगफ़िशर, डोंगो,फ्लाईकचर, बारबेट, ओरियल, मुनिया, बब्लेर आदि की अनेक पक्षी प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यहाँ स्थानीय पक्षियों के साथ आप्रवासी पक्षियों की अनेक प्रजातियाँ देखी जा सकतीहैं।

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बसंत ऋतु में खिले ऑर्किड्स  के रंगीन फूल

तकरीबन एक घंटे चलने के बाद, हम घने जंगल के बीच एक सुंदर झील के पास आ पहुंचे हैं। मेंढकों की टर्टराहट की आवाज़ आ रही है, हमारे झील के किनारे पहुंचते ही उन्हें किसी खतरे का एहसास होने लगा और छपाक से पानी मे छलांग लगाने लगे। तितलियाँ प्यास बुझाने के लिए झुंड के झुंड में मौजूद हैं। दरख्तों के प्रतिबिंब पानी में सुंदर तस्वीर बना रहे हैं। प्रकृति ने इन वृक्षों का भी श्रृंगार कर दिया है, इनकी शाखाओं पर मॉस (घास जैसी काई) उग आई है। दरअसल यह मॉस नम और घने जंगलों में रोशनी के अभाव में पेड़ की शाखाओं और तने पर उग आती है। इसी बीच मैं एक इंडियन रोलर की अठखेलियाँ कैमरे में कैद करने में भी सफल रहा।

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ऐसा लगता है वृक्षों ने अपनी शाखाओं पर मॉस का शृंगार कर लिया हैं
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सभी पक्षियों में इंडियन रोलर नामक पक्षी की उड़ान मेरे लिए सबसे पसंदीदा में है

कुछ देर हमने झील किनारे आराम किया।  इस सुंदर नज़ारे ने मन और मस्तिष्क में पुनः ऊर्जा का संचार कर दिया। अब वापसी का समय था, थोड़ी ढलान का फायदा मिला। हम जल्द ही सोमेश्वरी के तट पर लौट  आए, नदी के ठीक पार सिजु गुफा है। तभी संयोग से एक माँझी ग्रामीणों को नाव से नदी पार करवा रहा था, हम भी थोड़ा शॉर्टकट लेने के लिए पेड़ के तने से बनी इस नाव में बैठ गए। इस तरह नदी पार करना मेरे जीवन का पहला अनुभव था। और  हम तुरंत ही सिजु गुफा जा पहुंचे।

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पेड़ के तने से बनी इस नाव में तीन लोग एक साथ नदी पार कर सकते हैं

सिजु पक्षी अभ्यारण्य किस तरह पहुँचा जाएं?

सिजु सड़क मार्ग से गुवाहाटी (218 कि॰मी॰)और शिलांग (250 कि॰मी॰) से जुड़ा हुआ है। सिजु साउथ गारो हिल जिले के अंदर आता है। यह जिले मुख्यालय से 35 कि॰मी॰ है। विलियम नगर से 52 कि॰मी॰ है।

रात्रि विश्राम की व्यवस्था?

यहाँ फॉरेस्ट  गेस्ट हाउस है।

सिजु जाने का सही समय?

सितंबर से फरवरी सबसे उपयुक्त समय होता है।

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