सिजु गुफा, मेघालय

साउथ गारो हिल जिला, मेघालय 

08 मार्च, 2018

सिजु गुफा जिसे स्थानीय लोग ‘डोबाखोल ‘ के नाम से जानते हैं, राष्ट्रीय राजमार्ग 217 से 5 कि॰मी॰ दूर, अपर सिजु और लोअर सिजु गाँव  के बीच, सोमेश्वरी नदी के तट पर स्थित है। डोबाखोल का गारो भाषा में अर्थ है- चमगादड़ों की गुफा। मुख्य मार्ग (एन॰एच॰ 217) से गुफा को जोड़ने वाली एक सड़क, मेघालय के प्रथम मुख्यमंत्री कैप्टन विलियमसन संगमा की आदमकद प्रतिमा तक जाकर समाप्त हो जाती है। इसी प्रतिमा से सटी हुई सीढ़ियाँ हमे गुफा के प्रवेश द्वार की ओर ले जाती  हैं। गुफा का मुख सोमेश्वरी नदी के दाहिने किनारे पर स्थित है। यह नदी से 25 मीटर ऊंचाई पर है, इसका मुख एक चट्टान (क्लिफ) पर है। मुख-द्वार तकरीबन 30 फीट चौड़ा और 22 फीट ऊँचा है तथा इसके ऊपर पहाड़ से रिस-रिसकर पानी गिरता रहता है, इससे सीढ़ियाँ फिसलन भरी हो गई हैं। गुफा के अंदर से एक जलधारा बाहर की ओर आ रही है। गर्मियों में इसका जल स्तर घटकर 2-3 फीट रह जाता है। यह धारा आगे  सोमेश्वरी नदी में मिल जाती है।

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कैप्टन विलियमसन संगमा मेघालय के प्रथम मुख्यमंत्री थे, उनकी याद में सिजु गुफा के बाहर एक स्मारक बनाया गया है।
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सिजु गुफा एक सुरंग जैसी लगती है, जिसके अंदर से पानी की एक धारा साल भर बहती है।

हमने टॉर्च की मदद से गुफा के अंदर प्रवेश किया। टॉर्च की रोशनी से चमगादड़ों की बस्ती में हलचल सी मच गई। चमगादड़ छत पर टंगे हुए रहते है। पानी की धारा के साथ-साथ हम आगे बढ़ते गए। दिन का प्रकाश प्रवेश द्वार से लगभग 150 फीट अंदर तक जा सकता है, 150 से 350 फीट तक धुंधलका है और 350 फीट से आगे बिलकुल अंधकार है। मार्ग में बड़ी-बड़ी चट्टानें पड़ी हैं। कई जगह छत के नीचे गिरने से मलबा बिखरा पड़ा था।

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स्टैलेक्टाइट संरचनाएं, गुफा (केव सिस्टम) की मुख्य विशेषता होती है। ये पानी के कारण चूने के कार्बोनेट के जमाव से बनती है। जो छत या दीवारों से लटकती हुई रहती है।

आगे स्टैलेक्टाइट (पानी के कारण चूने के कार्बोनेट के जमाव से बनी संरचना जो गुफा की छत से लटकती है) संरचनाएं आने लगती हैं। टॉर्च की रोशनी में ये हीरे की तरह चमकने लगती हैं। थोड़ा आगे जाने पर हल्का दाहिना मोड आता है। यह गुफा एक सुरंग जैसी लगती है। इसमें कई उप-कक्ष भी  मिलते हैं, उनसे निकल रही छोटी – छोटी जल-धाराएँ मुख्य जल-धारा में मिलती जाती हैं। गुफा में पानी घुटनों तक आ रहा था जिस कारण जूते में पानी में भर गया। तकरीबन 900 फीट चलने के बाद रास्ता जोखिम-भरा और चुनौतीपूर्ण हो गया था, अत:  हमने वापस लौटना सुरक्षित समझा। रोमांच पसंद लोगों के लिए यह गुफा विशेष आकर्षण है।

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प्रवेश बिन्दु के बाहर का ऊपरी हिस्सा

सन 1881 में भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के टी॰ एस॰ लटौचे ने सिजु गुफा का दौरा किया। लेकिन 1924 में स्टेनली केंप और बी॰ चोपड़ा के निर्देशन में जैव सर्वेक्षण के साथ-साथ  गुफा की संरचना पर विस्तृत शोध पत्र प्रकाशित हुआ। उन्होंने गुफा में 3900 फीट अंदर तक प्रवेश किया। उनके इस शोध पत्र में एक दिलचस्प किस्सा भी मिलता है।  वे लिखते है  “जब वे गुफा के अध्ययन के लिए आये तो ग्रामीणों ने उन्हें बताया कि सेना के एक अधिकारी ने लगभग 40 या 50 साल (1875 के आस पास) पहले गुफा की खोजबीन की थी।  यहाँ उसने पूरा दिन बिताया था और सबसे दूर के बिंदु पर एक बोतल छोड़ दी थी।  उन्हें भी प्रवेश द्वार से 3900 फीट की दूरी पर जल-स्तर से लगभग 4 फीट ऊपर  एक  दरार में काँच की बोतल मिली। यह गंदे पानी से आधी भरी हुई थी, जिसके अंदर बोतल का कॉर्क तैर रहा था। अगर इसमें कभी कोई रिकॉर्ड  रखा गया होगा, जैसे कागज पर कुछ लिखा हो, तो भी वह अब तक पूरी तरह से खराब हो चुका होगा। कांच की इस बोतल के ऊपर जमी परत से लगता है कि यह लंबे समय से  यहाँ पड़ी हुई थी। “

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गुफा के अंदर से बाहर का नजारा

सिजु गुफा बांग्लादेश के सीमावर्ती जिले साउथ गारो हिल जिले में आती है। यह क्षेत्र विकास की दृष्टि से बेहद पिछड़ा है। सड़क, मोबाइल नेटवर्क, चिकित्सा आदि मौलिक सुविधाओं का गंभीर अभाव है। साउथ गारो हिल जिले के पिछड़ेपन की दास्तान हम अगले भागों में सुनाएंगे।

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सिजु वन क्षेत्र के बीट ऑफिसर एबाकर आर॰ मारक  के मार्गदर्शन व सहयोग से सिजु प्रवास, मेघालय यात्रा का सबसे यादगार हिस्सा बन गया।

सिजु किस तरह पहुँचा जाएं?

सिजु सड़क मार्ग से गुवाहाटी (218 कि॰मी॰)और शिलांग (250 कि॰मी॰) से जुड़ा हुआ है। सिजु साउथ गारो हिल जिले के अंदर आता है। यह जिले मुख्यालय बाघमारा से 35 कि॰मी॰ है। विलियम नगर से 52 कि॰मी॰ है।

रात्रि विश्राम की व्यवस्था?

यहाँ फॉरेस्ट  गेस्ट हाउस है।

सिजु जाने का सही समय?

सितंबर से फरवरी सबसे उपयुक्त समय होता है।

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