बालपकरम से चेरापुंजी

मार्च 09, 2018

यात्रा वृतांत के इस भाग में बालपकरम से चेरापुंजी तक के 160 कि॰मी॰ के सफर को समेटने की कोशिश करेंगे। यह यात्रा मुख्यतः भारत –बांग्लादेश सीमा पर थी। यायावरी के उन लम्हों में बिताया एक-एक पल चुनौतियों के साथ रोमांच से भरा था, जिसने मुझे भारत के छुपे हुए इस भू-भाग को करीब से जानने और समझने में मदद की। यह यात्रा जीवन की सबसे यादगार यात्राओं में से एक है। यात्रा के चुनिंदा अंश प्रस्तुत है-

दोपहर बाद 2 बजे बालपकरम से आगे का सफर शुरू हुआ। लक्ष्य था कि आज जितना हो सके चेरापुंजी के नज़दीक पहुँचा जाएं। लेकिन लक्ष्य को पाने में सबसे बड़ी बाधा थी – खराब सड़क। यह सड़क सरकारी रिकॉर्ड में स्टेट हाइवे-4 घोषित है, लेकिन वास्तविकता में एक कच्ची सड़क है। जिसकी काली डामर नेताओं की जेब भरने में चली गई।

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स्टेट हाईवे 4 की दशा, जिसने बालपकरम से चेरापुंजी के बीच की यात्रा को एडवेंचर यात्रा बना दिया।

पहले 1 घंटे में 21 कि॰मी॰ चलकर महेशकोला पहुँच पाया। महेशकोला ‘का वाह रोंगदी ’ नदी के किनारे बसा छोटा सा गाँव है। नदी के पुल को पार करते ही गाँव का बाज़ार आ गया। भूख लग रही थी, वही एक ढ़ाबे पर भोजन किया। दो पराँठे, सब्जी, अचार और चाय के 20 रुपये।

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महेशकोला गांव से गुजरती हुई “का वाह रोंगदी” नदी।

 

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महेशकोला में लगा दिशा-सूचक बोर्ड

 

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महेशकोला बाजार में  20 रुपये में खाने का स्वाद लिया।

खाना खाते ही ऊर्जा का एहसास हुआ। महेशकोला से कुछ दूर आगे चलते है तो सड़क, भारत-बांग्लादेश की अंतराष्ट्रीय सीमा के समानान्तर चलने लगती है। यहां सीमा पर तारबंदी है, जिसमे कुछ दूरी पर गेट बने है। तारबंदी के दूसरी तरफ बांग्लादेश का मैदान है। मेघालय से बांग्लादेश में प्रवेश करने वाली सैकड़ों नदियां हर साल इस मैदान में उपजाऊ मिट्टी ले जाती है, इसी वजह से यह बेहद उर्वर मैदान है।

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भारत-बांग्लादेश सीमा पर हाजोंग आदिवासी महिलाएं।

 

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महेशकोला के निकट भारत-बांग्लादेश सीमा।

मैं अपनी धुन में तेजी से आगे बढ़ रहा था कि एक जगह सड़क तारबंदी के गेट को पार करते हुये बांग्लादेश में प्रवेश कर गई। यह देख मैं रुक गया। दरअसल, मैं गलती से बांग्लादेश में घुस जाने के ख्याल से डर रहा था। क्योंकि मैंने भूलवश सीमा पार कर जाने के कई डरावने क़िस्से सुने हुए थे। वही से गुजर रहे एक राहगीर से मैंने पूछा तो उसने बताया कि भारतीय नागरिक इस पर चल सकते हैं। मैं और आगे बढ़ा तो ऐसे कई गेट आते गए। ऐसा लगा जैसे एक खिड़की खुलते ही भारत से बांग्लादेश पहुँच गए, फिर खिड़की बंद होते ही पुन: भारत वापस आ गया। तारबंदी के साथ-साथ हर 1-2 कि॰मी॰ पर सीमा सुरक्षा बल (बी.एस.एफ) की चेक-पोस्ट आती है। सीमा पर इन जवानों को देख मेरा हौसला बढ़ता गया। अब मैं इस रोमांचक यात्रा का खुलकर लुफ्त उठा रहा था।

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भारत-बांग्लादेश सीमा पर बना बॉर्डर गेट।

मुझे मोबाइल नेटवर्क में आए हुए दो दिन हो चुके थे। बाघमारा के बाद मोबाइल में सिग्नल नहीं थे। न ही किसी परिजन को मैं सूचित कर पाया कि मैं कहाँ था। मेघालय में अमूमन सीमावर्ती गाँवों में भारतीय मोबाइल नेटवर्क नहीं है, जबकि बांग्लादेशी नेटवर्क जैसे ग्रामीणफोन अच्छा काम करता है। मुझे जानकार हैरानी हुई कि भारतीय लोग बांग्लादेश के सिम का अवैध रूप से धड़ल्ले से इस्तेमाल करते है। वे अंतर्राष्ट्रीय कॉलिंग द्वारा मेघालय और देश के अन्य हिस्सों के संपर्क में रहते है। ऐसी ही हालत शिक्षा व स्वास्थ्य व्यवस्था की है। सड़क व्यवस्था घटिया स्तर की है। ऐसा लगता है ग्रामीण मेघालय अभावों का द्वीप है। इस हालत पर मुझे रह-रहकर कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता “देश कागज़ पर बना नक्शा नहीं होता” याद आती रही। तो अदम गोंडवी की कविता तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है मन को उद्देलित करती रही। मैं इन सीमावर्ती क्षेत्रों के निवासियों से मिला, उनसे बात की। तो इस निष्कर्ष पर पहुंचा वे आम भारतीयों से ज्यादा देशभक्त है।

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लकड़ी की बनी हुई पुलिया।

 

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मेघालय के गांवों में झाड़ू निर्माण आय का अच्छा स्रोत है।

दिन तेजी से ढल रहा था, बचे समय के हिसाब से रानीकोर पहुँचने की उम्मीद ही बची थी, शरीर पूरी तरह थक चुका था। अंतत: सूर्यास्त का समय था, मैं “किनशी नदी” के एक छोर पर खड़ा था, दूसरे छोर पर रानीकोर शहर दिख रहा था। यहाँ सेकिनशी नदी का विहंगम दृश्य दिखता है। इस नदी का नीला साफ पानी और सपाट बीच सैलानियों को खूब भाता है। ऐसे नजारों को हर कोई अपनी आँखों में बसा लेना चाहता है। मैं इस दृश्य को निहार ही रहा था कि मोबाइल की घंटी बजी। रेणु का कॉल था, वह डरी हुई थी क्योंकि पिछले दो दिन से मेरी कोई खबर नहीं थी। उसको व्हाट्सएप पर किनशी नदी का फोटो भेजा तो खुश हो गई।

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रानीकोर में किनशी नदी का साफ नीला पानी मनमोहक नजारा बनाता है।

किनशी नदी पर बने लंबे पुल को पार करके मैं रानीकोर में पहुंच गया। यह दक्षिण-पश्चिम ख़ासी हिल जिले का एक शहर है। यह अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर होने के कारण सामरिक महत्व की जगह है। बाघमारा में रुपये नहीं निकाल पाने के कारण पैसों की तंगी थी। अत: सबसे पहले एटीएम का पता पूछा। वहाँ से नगदी निकाली तो पास ही एक व्यक्ति ब्लैक में 80रू/लीटर में पेट्रोल बेच रहा था (बाघमारा में मैंने ब्लैक में 120रू/लीटर ख़रीदा था), पूरी फ़्यूल टैंक फुल करवा लिया। अब आत्मविश्वास चरम पहुंच गया – जेब में रुपये और मोटरसाइकल में पेट्रोल था। एक ढाबे पर खाना खा लिया, इस ढाबे को एक मिलनसार महिला चलाती है। उसने पीडबल्यूडी गेस्ट हाउस में रूम दिलाने के लिए खूब प्रयास किया लेकिन कोई रूम खाली नहीं मिला। उसके खुद के गेस्ट हाउस भी पूरा भरा था। इसी दौरान मेरी उससे खूब बातें हुई। वह 26 साल की उम्र में ही चार बच्चों की माँ है। उसने कौतूहल भरे का भाव से मुझसे पूछा “आप यहाँ अकेले आए हो, डर नहीं लगा?” मैंने जवाब दिया “मैं अपने ही देश में हूँ, यहाँ अपने ही लोग है।” उसे सुनकर अच्छा लगा। सारी जुगत लगाने के बाद भी ठहरने की कोई व्यवस्था नहीं बन पाई। मैं परेशान था। फिर अचानक से मेरे मन में ख्याल आया क्यों न समीपवर्ती किसी बीएसएफ़ कैम्प में चला जाये।

थोड़ी देर में मैं रानीकोर के बीएसएफ़ कैंप जा पहुंचा। वहाँ तैनात एक जवान को अपना परिचय दिया और यथास्थिति से अवगत कराते हुए रातभर ठहरवाने का आग्रह किया। मैंने कस्टम की आईडी भी दे दी। उसने वॉकी-टॉकी पर अपने ऑफिसर को पूरा ब्यौरा दिया। उधर से निर्देश आया कि गेस्ट हाउस का रूम दे दिया जाए और साथ में खाने की व्यवस्था भी। मुझे इस तरह की मुसीबतों में अपने विभागीय पृष्ठभूमि की हमेशा मदद मिली है। मैं बीएसएफ़ की इस गर्मजोशी से अभिभूत था, कृतज्ञ था। मैंने विनम्रतापूर्वक खाने के लिए मना कर दिया। अब तक मेरा कई जवानों से परिचय हो चुका था, उनमें से एक था सीकर राजस्थान का श्रीराम। वह बीएसएफ में नाविक है। वह पहले जयपुर में ही रहता था। उसकी अगले महीने शादी होनी थी। गेस्टहाउस ठीक किनशी नदी के किनारे था। बिस्तर पर जाते ही नींद आ गई।

मार्च 10, 2018

सुबह उठकर देखा तो खुद को किनशी नदी की गोद में पाया। गेस्ट हाउस ठीक किनशी के किनारे है। कमरे की खिड़की से शांत बह रही नदी का सुंदर नजारा दिख रहा था। यह एक सुहानी सुबह थी। थोड़ी ही देर में श्रीराम पराँठे और चाय ले आया। एक हफ्ते बाद घर के खाने का एहसास हुआ। मन बीएसएफ़ की मेहमान नवाज़ी से गदगद था। मैंने सभी को शुक्रिया कहते हुए अलविदा कह दिया।

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रानीकोर के बी.एस.एफ कैम्प में सुबह का नाश्ता।

 

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रानीकोर में किनशी नदी का दृश्य।

कल रात हो गई थी। इसलिए अभी रानीकोर घूमना बाकी था। सबसे पहले किनशी बीच पहुंचा। कुछ जरूरी फोटो लिए और फिर रानीकोर बाजार से होते हुए, चेरापुंजी की और चल दिया। रानीकोर से 20 किमी आगे “वाह उमंगी” नदी आती है, उसके दूसरे छोर पर डांगर गाँव है। इस नदी को पार करने के दो तरीके है पहला सड़क द्वारा 15 किमी का चक्कर है व दूसरा फेरी में मोटरसाइकल रखकर 5 मिनट में नदी के दूसरे छोर पर पहुँच सकते है। मैंने दूसरा चुना क्योंकि फेरी में रखकर मोटरसाइकल पार करने का मौका पहली बार मिला था, मैं इसे छोड़ना नहीं चाहता था।

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‘वाह उमंगी नदी’ पर मोटरसाइकल फेरी से पार की।

डांगर गाँव के बाजार से होते हुए मैं सोनाटोला गाँव पहुंचा। यहाँ झाड़ू बनाने का काम किया जाता है। इससे आगे है रिंगकु। रिंगकु से पहले भी एक छोटी नदी है। जिसे मार्च में बिना फेरी के पार किया जा सकता है। इस नदी के तट पर ग्रामीण नहा रहे थे। यह देख मुझसे भी रहा नहीं गया और नदी में जा कूदा। इसी बीच मुझे बाहर से आया हुआ जानकर एक हाजोंग युवक मेरे पास आया, मुझसे मेरे बारे में पूछने लगा। मैं इस दौरान नदी के पानी में ही बैठा रहा। उससे हाजोंग जनजाति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां मिली। मोटरसाइकल भी धूल में हो रही थी, उसको भी नदी में नहला दिया।

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रिंगकु के समीप एक नदी, भारत-बांग्लादेश सीमा।

 

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यह यात्रा भूगोल, प्रकृति, समाज और सभ्यता को जीते हुये आगे बढ़ती है। रिंगकु के निकट में नदी में स्नान का आनंद लिया।

 

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रिंगकु के समीप नदी पर।

मैं इस जगह पर और रुकना चाहता था लेकिन आधे घंटे रुककर जाना पड़ा। क्योंकि हर हाल में आज चेरापुंजी पहुँचना था। यहाँ से 15 किमी आगे शेला है, जो समुद्रतट से 100मीटर की ऊँचाई पर है। शेला से पहले “वाह उमियाम” नदी है जिसे फेरी द्वारा पार करना होता है। लेकिन मुझे कोई फेरी नहीं मिली। सभी फेरियाँ नदी के गोल पत्थर की तस्करी कर बांग्लादेश पहुँचाने में व्यस्त थी। नदी 2-3 फीट गहरी थी, मेरे सामने ही एक ट्रक निकला था। लोगों ने बताया कि मोटरसाइकल निकल जाएगी। लेकिन नदी में मोटे मोटे चिकने पत्थर थे। हिम्मत करके मोटरसाइकल नदी में उतार तो दी लेकिन बीच में जाकर पत्थरों के बीच उलझ कर रह गई। तब मैंने बांग्लादेशी लोगों से मदद की गुहार लगाई तो तीन लोगों ने धक्का दिया। जैसे तैसे दूसरे किनारे पर जा पहुंचा। मैं कमर से नीचे तक भीग चुका था। यहाँ एक पुलिया बनाने का काम कई साल से चल तो रहा है पर आज तक पूरा नहीं हो पाया।

अभी भी चेरापुंजी करीब 35 किमी था। पूरा शरीर जवाब दे चुका था, ऊपर से आधा शरीर गीला था। मैं जल्दी से किसी होम स्टे में पहुँचना चाहता था। अब मैं तेजी से चेरापुंजी की तरफ मोटरसाइकल दौड़ाने लगा। चेरापुंजी समुद्रतट से 1200-1300 मीटर की ऊंचाई पर बसा पर्यटक शहर है। यह दुनिया में शीर्ष वर्षा वाले स्थान में से एक है। चेरापुंजी आते-आते ठंड का एहसास होने लगा क्योंकि पिछले 35 किमी में 1100-1200 मीटर का ऊंचाई पर आ चुका था। चेरापुंजी में Goibibo पर नलग्रे होम-स्टे की बुकिंग कर ली, यह शहर के बाहरी हिस्से में है। 4 बजे मैं कमरे में था। दिन अभी बचा था पर मैं आराम करना चाहता था।

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चेरापुंजी में सूर्यास्त के दृश्य

 

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बालपकरम से चेरापुंजी का  रास्ता