उत्तराखंड: फूलों की घाटी ट्रेक- भाग-1

जयपुर से रुद्रप्रयाग

अगस्त 12, 2017। रेणु, नीरज और मैं रात 10 बजे जयपुर जंक्शन पर उदयपुर-हरिद्वार एक्सप्रेस का इंतज़ार कर रहे थे। रेणु और मेरा टिकिट एसी-3 में कन्फ़र्म था और नीरज की वेटिंग क्लियर नहीं हुई थी। उस दिन ट्रेन निर्धारित समय से 1:00 घंटे की देरी से चल रही थी। इस यात्रा के लिए बेहद रोमांच चरम पर था। कॉलेज के दिनों से ही मैं भारत के नक्शे पर अपने पसंदीदा जगहों को चिन्हित करता आया था, उनमें सबसे ऊपर फूलों की घाटी था। ट्रेन के आते ही हम आरक्षित सीटों पर आ गए, अब आदमी तीन और सीट दो थी। इसलिए रेणु मिडिल बर्थ पर और नीरज व मैं ऊपरी बर्थ पर टीक गए।

सुबह आँखें खुली तो ट्रेन शामली स्टेशन को पार कर रही थी। ट्रेन गंगा-यमुना के हरे-भरे दोआब से हिमालय की तरफ दौड़ रही थी। हरिद्वार नजदीक आते ही हरी-भरी कम ऊंचाई की पहाड़ियाँ दिखने लगती है। किस्मत अच्छी थी हरिद्वार तक किसी टी॰टी॰ ने हमसे सवाल नहीं पूछा। ट्रेन करीब 11 बजे हरिद्वार पहुँची। रेल्वे स्टेशन के सामने ही बस स्टैंड है। बस स्टैंड पहुंचे तो मालूम हुआ बद्रीनाथ की तरफ जाने वाली अंतिम बस जा चुकी थी। गोविंदघाट, बद्रीनाथ से 25 किमी पहले आता है। अब एक ही उम्मीद थी ऋषिकेश से कोई बस मिले। यहाँ से ऋषिकेश 25 कि॰मी॰ है। हम एक टुकटुक में बैठ गए। बस स्टैंड से आगे बाजार में खूब ट्रेफिक जाम मिला। टुकटुक वाले ऐसे जगह के एक्सपर्ट होते है जल्दी ही जाम से निकल गए। आगे सोंग नदी मिली। ऋषिकेश की तरफ जाने पर चढ़ाई आने लगती है, तो टुकटुक की गति धीमी होती गई। जैसे ही श्यामपुर पुलिस चौकी पार की टुकटुक का गीयर अटक गया। अब इसकी गति और कम हो गई। हम 1 बजे के आसपास ऋषिकेश बस स्टैंड पर थे।

बायें शीर्ष से क्लॉकवाइज़: 1. श्रीनगर -कीर्तिनगर के मध्य अलकनंदा घाटी में स्थित खेत। 2. अलकनंदा के किनारे बसा कीर्तिनगर। 3. कर्णप्रयाग संगम। 4. कालेश्वर के निकट अलकनंदा द्वारा निर्मित सुंदर भूदृश्य।
बायें शीर्ष से क्लॉकवाइज़: 1. लंगासु के निकट। 2. जोशीमठ के रास्ते ऊंचाई से गिरता जलप्रपात। 3. चमोली के रास्ते सीढ़ीनुमा खेत।

बद्रीनाथ की तरफ जाने वाली कोई भी बस नहीं मिली। वहाँ रुद्रप्रयाग तक जाने वाली एक आखिरी बस सवारियाँ भर रही थी। उस दिन हम गोविंदघाट के निकटतम पहुँचना चाहते थे हम उसी में बैठ गए। बस चन्द्रभागा नदी पर बनी पुलिया को पार करके ऋषिकेश से बाहर निकल गई। अचानक ही सामने विशाल हिमालय था। सड़क पहाड़ के ढलान पर बनी है। नीचे गहरी घाटी है, जिसमें गंगा नदी बह रही है। इतनी ऊंचाई पर चल रही बस से नीचे देखने में दर लग रहा था। जब चालक बिना परवाह के घुमावों पर भी बस को तेजी से निकालता, तो हमारा डर और बढ़ जाता।  एक के आगे एक पहाड़ हिमालय की समांतर श्रेणियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन पहाड़ों को लम्बवत काटती हुई गंगा नदी मैदानों में उतरती है। इससे मनोरम दृश्यों का निर्माण होता है। मैंने सिविल सेवा की पढ़ाई के दौरान भूगोल में हिमालय का अध्ययन किया था। लेकिन अब समझ आ रहा था किताबी ज्ञान और वास्तविकता में कितना अंतर होता है। ऋषिकेश से 75 किमी आगे देवप्रयाग आता है। देवप्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी का संगम होता है, संगम बाद से नदी को गंगा नाम मिलता है। सनातन मान्यताओं में हरिद्वार व ऋषिकेश की तरह ही देवप्रयाग भक्ति और आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहाँ बस थोड़ी देर रुकी, हमने यहाँ चाय-पानी पिया। देवप्रयाग से आगे आता है कीर्तिनगर-श्रीनगर। यहाँ अलकनंदा नदी ने चौड़ी घाटी का निर्माण किया है, इसलिए श्रीनगर जैसा बड़ा नगर बस सका। श्रीनगर से आगे आता है रुद्रप्रयाग। यहाँ मन्दाकिनी और अलकनंदा नदियों का संगम है। रुद्रप्रयाग पहुँचते-पहुँचते संध्या हो गई। यही पर होटल गैलेक्सी में रात्रि विश्राम किया। कल सुबह 5 बजे बद्रीनाथ की बस लगेगी।

रुद्रप्रयाग–गोविंदघाट-घांगरिया

बायें शीर्ष से क्लॉकवाइज़: 1. जोशीमठ के रास्ते गहरे गॉर्ज से बहती हुई अलकनंदा नदी। 2. जोशीमठ के रास्ते में सुंदर हेयर-पिन मोड़। 3. श्रीनगर, उत्तराखंड 4. अलकनंदा नदी के ऊपर, बायें तरफ स्थित है गोपेश्वर व दायें तरफ नीचे है चमोली।

प्रातः जल्दी तैयार होकर बद्रीनाथ जाने वाली पहली बस के टिकट ले लिए। सुबह की इस बस को लोग डाक-गाड़ी बोलते हैं। हमे फूलों की घाटी और हेमकुंड साहिब जाने के लिए गोविंद घाट उतरना होगा। रुद्रप्रयाग से गोविंद घाट करीब 130 किमी दूर है।  इस बस की रफ्तार काफी कम थी, यह हर छोटे-बड़े गाँव व नगर से डाक डालने या उठाने का काम कर रही थी। बस में अधिकतर स्थानीय लोग थे। किसी को कोई जल्दी नहीं। बस का चलना या नहीं चलना, बस ड्राईवर-कंडक्टर पर निर्भर था। इससे एक बात तो स्पष्ट थी पहाड़ी जीवन अभी तक भागदौड़ से दूर था। रुद्रप्रयाग से आगे आता है कर्णप्रयाग। यहाँ अलकनंदा और पिंडार नदियों का संगम है। कर्णप्रयाग से आगे है नन्दप्रयाग। यहाँ अलकनंदा और नंदाकिनी नदियों का संगम है। यहाँ से आगे चमोली-गोपेश्वर आता है। यह एक बड़ा नगर है। यहाँ बस करीब 30 मिनट से ज्यादा रुकी। यही पर खाना खाया। इससे आगे जोशीमठ आता है। यह करीब 2000 मीटर की ऊंचाई पर बसा नगर है। यहाँ पर आदि शंकराचार्य स्थापित द्वारा चार ज्योतिष पीठों में से एक है। सर्दियों में भगवान बद्रीनाथ की गद्दी यही विराजमान होती है। जोशीमठ औली, नीति, माना व बद्रीनाथ जैसे स्थलों के नजदीक है। यही से अनेक दुर्गम ट्रेक और चोटियों की चढ़ाई के लिए जाया जाता है। जोशीमठ से नीचे उतरते ही विष्णुप्रयाग आता है यहां धौलीगंगा नदी का अलकनंदा में संगम होता है। यही पर हाइड्रोपावर से विद्युत उत्पादन किया जा रहा है।

जोशीमठ से 20 किमी चलकर हमारा गंतव्य गोविंद घाट आ गया। गोविंद घाट में लक्ष्मण गंगा नदी, अलकनंदा में मिलती है। गोविंद घाट से आगे घांगरिया जाना है जो यहाँ से 12 किमी दूर है। जिसमें शुरुआती 4 किमी वाहन-योग्य सड़क है। उसके बाद घांगरिया तक पैदल ट्रेक है। इनके बीच आता है भ्युंडार गांव। भ्युंडार तक लक्ष्मण गंगा के बायें छोर पर पगडंडी जाती है। इसी गाँव के नाम से इस घाटी को भ्युंडार घाटी कहा जाता है। भ्युंडार में फूलों की घाटी से निकलने वाली पुष्पावती नदी, लक्ष्मण गंगा में समाहित हो जाती है। भ्युंडार से आगे पुलिया पार करके पगडंडी नदी के दायें छोर पर चलने लगती है। इस घाटी में जून, 2013 की बाढ़ में भारी तबाही हुई थी।

बायें शीर्ष से क्लॉकवाइज़: 1 व 3. गोविंदघाट-घांगरिया के रास्ते। 2. पहाड़ों से गिरता एक झरना। 4. गोविंदघाट-घांगरिया ट्रेक। मध्य में: 5. भ्युंडार गाँव के निकट।

इस पगडंडी के साथ-साथ गोविंद घाट से ही जंगल शुरू हो जाता है। विचित्र पक्षियों की आवाज़ आने लगती है। कई जगह ऊंचे पर्वतों से झरने भी गिर रहे होते है। साथ ही पूरे रास्ते आपके साथ होते हैं । सब देखकर महसूस होता है प्रकृति आज भी यहाँ अपने वास्तविक स्वरूप में मौजूद है। गोविंद घाट समुद्रतट से 1900 मीटर ऊंचाई पर है और घांगरिया 3100 मीटर पर। अभी तक आसान ट्रेकिंग थी। इस पूरे ट्रेक में हेमकुंड साहिब गुरुद्वारा जाने वाले सिख तीर्थयात्रियों का जमावड़ा रहता है। वे यहाँ हर वर्ष हजारों की संख्या में आते है। गोविंद घाट से घांगरिया के लिए पवनहंस हेलीकाप्टर सेवा भी उपलब्ध  है। खासकर वृद्ध और शारीरिक रूप से कमजोर लोग खच्चर से घांगरिया पहुँचते हैं। खच्चरों द्वारा किया गया गोबर पूरे रास्ते में दुर्गंध फैलता है, लेकिन कुछ दूर चलने के बाद व्यक्ति इसका आदी हो जाता है।

बायें शीर्ष से क्लॉकवाइज़: 1. घांगरिया गाँव जो गाँव फूलों की घाटी का बेसकंप है। 2-3. घांघरिया के रास्ते में।

गोधूलि की बेला में हम घांगरिया पहुँच गए। यहाँ रुकने के लिए गेस्ट हाउस या होटल की पूछताछ की। लेकिन सभी भरे हुए  थे। यह 14 अगस्त की शाम थी। प्रयत्न के बाद भी कुछ नहीं मिला तो हमने घांगरिया गुरुद्वारे में शरण ली। हमे यहाँ एक अलग कोठरी मिल गई। यही पर लंगर में खाना खाया।  रात का पारा काफी कम था। कल सुबह की शुरुआत फूलों की घाटी से की जाएगी। ठंड से कांपते-कांपते  नींद आ गई।

फूलों की घाटी ट्रेक

स्वतंत्रता दिवस की सुबह थी। हमारे साथ सैकड़ों पर्यटक थे। सभी इस दिन को यादगार बनाने के लिए फूलों की घाटी ट्रेक के लिए उत्सुक थे। हमने 6.20 पर पार्क का टिकट ले लिया। बीते दिनों झीनी-झीनी  बारिश होती रही थी, संयोग से आज आकाश साफ था। यहाँ 7 बजे के बाद पार्क में प्रवेश शुरू होता है। प्रवेश द्वार से  कुछ देर चलते है तो पुष्पावती नदी पर बनी छोटी सी पुलिया आती है। इसके एक और 90 डिग्री पर लम्बवत खड़ा विशाल पर्वत है, इसे देखकर मन में रोमांचक तरंगें उठने लगती है। अभी तक मैंने अरावली की छोटी पहाड़ियाँ ही देखी थी। मैं अब वास्तव में महसूस कर पा रहा था कि हिमालय को यूँही नहीं भारत का मुकुट कहा गया। इसके आगे रास्ता फिसलन भरा आ गया, साथ ही तीखी चड़ाई भी। दरअसल 2013 की बाढ़ में “फूलों की घाटी” भी भारी नुकसान हुआ था व तमाम पुल और परंपरागत पैदल मार्ग यानि ट्रेक बाढ़ में नष्ट हो गए। बाद में तीन साल तक चले पुनर्निर्माण के बाद फूलों की घाटी को 2016 में पुनः पर्यटकों के लिए खोला गया। 

बायें शीर्ष से क्लॉकवाइज़: 1. फूलों की घाटी नेशनल पार्क का नक्शा। 2. घाटी की तरफ जाते पर्यटक। 3-4. घाटी के अंदर का भू-दृश्य ।

इस घाटी का इतिहास भी रोचक है सन 1862 में पुष्पावती घाटी की खोज कर्नल एडमंड स्मिथ ने की।  बाद में 1931 में ब्रिटिश पर्वतारोहियों का एक दल कामेट पर्वत के सफलतापूर्वक अभियान से लौटते समय रास्ता भटक गया और एक ऐसी जगह पहुंचा जहां चारों तरफ अनेक प्रकार के फूल ही फूल खिले थे। उन्होने इस जगह पर एक किताब लिखी व इस घाटी को “वैली ऑफ फ्लावर्स” नाम दिया। इसके बाद यह घाटी इसी नाम से दुनिया में मशहूर हो गई। इसी क्रम में सन 1939 में ब्रिटिश पादपविज्ञानी जोन मारग्रेट लेगी इस घाटी के गहन अध्ययन के लिए यहाँ आई परंतु अध्ययन के दौरान ही एक ऊंची चट्टान से फिसल कर गिरने से इनकी मौत हो गई। बाद में उनकी बहन ने उस जगह एक कब्र बनवाई। मारग्रेट लेगी इस घाटी से निश्चल प्रेम के लिए अमर हो गई। 1982 में भारत सरकार ने इसकी जैव विविधता के संरक्षण के लिए इसे नेशनल पार्क का दर्जा दिया तथा 2005 इसे में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल में शामिल किया गया।

फूलों से सजी यह घाटी पृथ्वी पर स्वर्ग का एहसास देती है। चारों और बर्फ से ढ़की चोटियाँ इस भूभाग को साल भर पानी की आपूर्ति करती है।
इस घाटी के मध्य से पुष्पावती नदी बहतीहै।

घांगरिया से घाटी की तरफ चलने पर समुद्रतट से 3300 मीटर की ऊंचाई के करीब ट्रीलाइन खत्म होने लगती है, ट्रीलाइन खत्म होने के साथ अल्पाइन मीडोज शुरू होते है जिन्हें स्थानीय भाषा में बुगयाल कहाँ जाता है। घाटी में घुसते ही सामने था फूलों का जीता जागता स्वर्ग। इसे  देखते ही मन में ख्याल आया जैसे प्रकृति ने अपनी पूरी सुंदरता यहाँ लूटा दी हो। इस प्राकृतिक स्वर्ग के चारों और महान हिमालय के पर्वत है जिनकी ऊंचाई 4500 मी॰ से 6000 मी॰ तक चली जाती है। जून महीने के शुरुआत से ही इस घाटी में बर्फ पिघलने लगती है, जिससे जीवन का नए आयाम शुरू होता है।  इन पर्वतों के ऊपरी हिस्सों पर वर्ष भर बर्फ जमी रहती है। जब यह बर्फ पीघलती है तो दूध जैसे सफ़ेद झरने फूटने लगते है। ये झरने आगे चलकर जलधाराओं के रूप में पुष्पावती नदी में मिल जाते हैं। पूरे पैदल मार्ग पर ऐसी ही जल धाराएँ पार करना होता है। इनका जल बेहद ठंडा होता है जिसे पीने पर पेट के अंदर तक महसूस किया जा सकता है। हम घाटी के मुख्य हिस्से में पहुँचे तो लगा जैसे नाना प्रकार के फूल हमारे स्वागत में खिलखिला रहे थे। इन खिले हुये फूलों की खूशबू हवाओं में घुली हुई थी। भँवरे मदहोश होकर फूलों का रस पी रहे थे।

फूलों की घाटी में फूलों की सैकड़ों प्रजातियाँ पाई जाती है। उनमें से कुछ केवल इसी घाटी में पाई जाती है।
यहाँ पाये जाने वनस्पति पर शोध व अध्यनन के लिए दुनिया भर से विद्वान आते हैं।
नाना प्रकार के फूलों इस घाटी को अनुपम सौंदर्य प्रदान करते है।
फूलों की घाटी में प्रवेश बिन्दु से लेकर अंत तक स्थान विशेष के साथ फूल की प्रजाति भी बदलती पाई जाती है।
यहाँ मुख्यत: जून से सितम्बर तक ही फूल खिलते हैं। साल के बाकी महीनों में बर्फ जमी रहती है।

सनातन मान्यताओं में इसे ही नन्दन कानन  (स्वर्ग में इंद्र का बगीचा)  कहा गया है। यहाँ आने के बाद तनिक भी संशय नहीं रहता है कि पूरी दुनियाभर में यह जगह इतनी पसंदीदा क्यों है। ट्रीलाइन तक चढ़ाई में आगंतुकों को भले ही मुश्किलों का सामना करना पड़े लेकिन वह जैसे ही फूलों को नजर भर देखता है, वह स्वत: ही आगे बढ़ने लगता है। यहाँ एक अजीब सा सम्मोहन है जो व्यक्ति को  मोहित कर लेता है। हम प्रारम्भ बिंदु से करीब 8 किमी तक चलते गए। अंत में पुष्पावती नदी का पेंदा आ जाता है। और यहाँ से आगे शुरू होते है वर्ष भर जमे रहने वाले ग्लेसियर। इन ग्लेसियरों में हिमालयन भालू जैसे जीव पाये जाते हैं। पुष्पावती नदी की गोद में कुछ देर सुस्ताने के बाद हम घांगरिया बेस कंप की और वापस लौटने लगे।           

इस घाटी में कठोर जलवायु होती है इसलिए यहाँ फूल भी चटक रंग के खिलते हैं।
1982 में इस घाटी को नेशनल पार्क का दर्जा मिला। साथ ही यहाँ मवेशियों के चरने पर भी प्रतिबंध लगा दिया।

सूर्य तेजी से पहाड़ों के पीछे जा रहा था, आसमान सिंदूरी होकर संध्या के स्वागत में था। हम अल्पाइन मिडोज को पीछे  छोड़कर ट्रीलाइन में आ गए। अब चीड़ के विशाल दरख्त पक्षियों से आबाद थे। चारों और पक्षियों की चहचहाहट से माहौल खूसनुमा था। थोड़ा नीचे पुष्पावती कल-कल करते हुए घाटी से बह रही थी। मैं इन हसीन नजारों में हमेशा के लिए खो जाना चाहता था। प्रकृति का संगीत मानव के लिए सदा से ही प्रेरणा दायक रहा है। इसने तमाम मुश्किलों से जीतने का हौसला दिया है। मैं इन खूबसूरत नजारों में बेसुध सा चल रहा था। वक़्त तेजी से गुजर गया, संध्या से रात्रि हो चुकी थी।

2013 की उत्तराखंड बाढ़ ने घाटी के प्राकृतिक में व्यापक बदलाव कर दिया लेकिन सौभाग्य से फूलों वाली जगह ज्यादा नुकसान नहीं हुआ।
यहाँ पर्यटकों की बेतहाशा वृद्धि के कारण 2017 में 300 पर्यटक/दिन की सीमा निर्धारित कर दी गई है।

हमने सुबह ट्रेक पर जाने से पहले गुरुद्वारे का कमरा खाली कर दिया था क्योंकि एक होटल में जगह मिल गई थी। हालांकि खाना गुरुद्वारा लंगर में ही खाया। लंगर से बेहतर खाना किसी भी रेस्टोरेन्ट में नहीं था। रात्रि में झींगर प्रजाति के जीव अपना जीवन संगीत शुरू कर देते हैं। जब रात्रि में जब आकाश से बादल हटते तो तारों की मेखलायें नजर आने लगती थी। फूलों की घाटी का यह ट्रेक थका देने वाला जरूर है, मगर मानव को प्रकृति के बेहद करीब ले जाता है। थकान से शरीर हरकत में नहीं था। अब कल सुबह हेमकुंड साहिब की यात्रा शुरू की जाएगी।

फूलों की घाटी कैसे पहुंचा जाए?

फूलों की घाटी के निकटतम शहर गोविंदघाट है। जो हरिद्वार-बद्रीनाथ मार्ग पर स्थित है। गोविंदघाट हरिद्वार और ऋषिकेश से क्रमश: 290 और 270 किमी है। रोजाना सुबह हरिद्वार व ऋषिकेश से गोविंदघाट के लिए बस मिलती है। यहाँ पहुँचने में करीब 10-12 घंटे लगते हैं। गोविंदघाट से करीब 4 किमी तक जीप जाती है। उसके बाद घाघंरिया बेस कैंप तक 8 किमी पैदल ट्रेक है।

घांगरिया में गढ़वाल विकास मंडल निगम के गेस्टहाउस के अलावा अन्य होटल भी है। घांगरिया गुरुद्वारा में भी विश्राम किया जा सकता है। खाने के लिए गुरुद्वारे का लंगर सबसे अच्छा है।

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