भीमबेटका शैलाश्रय (Rock Shelters): चित्रकारी, प्राकृतिक इतिहास व आदिवासीयत

यह 1957 का साल था, एक महान रहस्योदघाटन होने जा रहा था। पुरातत्वविद डॉ॰ विष्णु श्रीधर वाकणकर ट्रेन से भोपाल का सफर कर रहे थे , जब ट्रेन रातापानी के जंगल से गुजरी तो पहाड़ों की कुछ असामान्य चट्टानों की तरफ उनकी नजर पड़ी। वे एक दिन उन चट्टानों के अध्ययन के लिए जंगल में घूम रहे थे तो संयोग से उन्हें कुछ रॉक शेल्टर्स (गुफा) नजर आये। उन गुफाओं की दीवारों पर चित्रकारी की हुई थी। यह भीमबेटका के रॉक शेल्टर्स थे, जो अतीत में आदिमानव के निवास स्थल रहे थे। पुरातत्वविदों द्वारा किये उत्खनन से ज्ञात हुआ कि वहाँ 1 लाख साल पहले से मानव जीवन (होमो इरेक्टस) अस्तित्व में था। साथ ही इस खोज में मालूम हुआ कि दीवारों पर बने कुछ चित्र 30,000 वर्ष (पलियोलिथिक काल) पुराने हैं। इस खोज ने भारत के भीतर मानव जीवन के क्रमिक विकास के रहस्य को सुलझाने का कार्य किया।

भारत का यह महान अतीत रातापानी के सघन वनों में सदियों से छिपा था, जबतक की 1957 में डॉ वाकणकर द्वारा खोज ना लिया गया।

डॉ॰ वाकणकर इस खोज के साथ अमर हो गए, उन्हें भारतीय रॉक आर्ट के “पितामह” कहा गया। विंध्यन पर्वत माला के ढलान पर स्थित भीमबेटका को महाभारत काल से संबद्ध माना गया है, ऐसी लोकमान्यता है कि वहाँ पांडवों ने अज्ञातवास का कुछ समय बिताया था। इन गुफाओं में प्राचीन मानव ने परस्पर संवाद स्थापित करने तथा भावी पीढ़ियों के लिए संदेश के उद्देश्य से इन चित्रों को बनाया होगा। प्राकृतिक रंगों से बने इन चित्रों में दैनिक जीवन, त्यौहार, कृषि व शिकार जैसे दृश्यों का चित्रण किया गया है। चित्रों के लिए इस्तेमाल हुये रंग हजारों वर्ष बीत जाने के बाद भी जीवंत अवस्था में है। जो उस दौर के मानव के तकनीकी ज्ञान के स्तर को दर्शाता है। रंगों में मुख्य रूप से गेरुआ, सफ़ेद और लाल है, कहीं-कहीं पीला और हरा रंग भी प्रयुक्त हुआ है। यहाँ 15 गुफाओं को पर्यटकों के लिए खोला गया है। इन गुफाओं (रॉक शेल्टर) में ऑडिटोरियम गुफा अहम है, जो सबसे विशाल है। एक अन्य महत्वपूर्ण गुफा “जन्तु शैलाश्रय” (Zoo Rock shelter) है, जिसमे सैकड़ों जंतुओं के चित्र बने हैं। इन रॉक शेल्टर्स में 19 प्रजातियों के जंतुओं जैसे बायसन, बाघ, हाथी, राइनो, सूअर, घोड़े, हिरण मुख्य है। बाद के चित्रों में कृषि कार्यों और धार्मिक जीवन का चित्रण है जो बताता है कि पहाड़ों पर स्थित इन गुफाओं से उतर कर मानव ने खेती करना सीख लिया था तथा धर्म सामाजिक जीवन का हिस्सा बन रहा था। डॉ॰ वाकणकर ने एक चित्र में त्रिशूल जैसे शस्त्र लिये मानव आकृति को “नटराज” नाम दिया था।

ऑडिटोरियम गुफा सबसे बड़ा रॉक शेल्टर है, इसमें हुये उत्खनन से 1 लाख वर्ष पूर्व के मानवीय अवशेष पाये गए है।

यह क्षेत्र मालवा पठार का हिस्सा है, रॉक शेल्टर (कोर क्षेत्र) के आसपास बफर क्षेत्र में गोंड, प्रधान और कोरकू जंजातियाँ निवास करती है। पुरातत्वविद यशोधर मथपाल के अध्ययनों से बल मिलता है कि भीमबेटका के चित्र और स्थानीय आदिवासी समुदायों के बीच मजबूत सांस्कृतिक संबंध थे। इन आदिवासी समुदायों की वर्तमान जीवन शैली और लोक मान्यताओं में भीमबेटका संस्कृति शामिल है। विशेष रूप से घरों की दीवारों पर चित्र बनाने की परंपरा के साथ समानताएं हैं जो रॉक शेल्टर में बने चित्रों के साथ निरंतरता को प्रदर्शित करती है। इसी तरह के सजावटी तत्व बर्तन और रोजमर्रा के उपयोग की अन्य दस्तकारी वस्तुओं पर पाए जाते हैं। आदिवासी अभी भी शिकार और खाद्य पदार्थों को इकट्ठा करने के लिए अकसर वनों का उपयोग करते हैं – ठीक वैसे ही जैसे गुफा चित्रों में चित्रित किया गया है। शायद इनके ही पूर्वज, भीमबेटका शैलाश्रयों के चित्रों के चित्रकार थे। भीमबेटका का शाब्दिक अर्थ है भीम की बैठक का स्थान। “भीम” इन जनजातियों के लिए या तो नायक या फिर देवता है। हालांकि इन सम्बन्धों की स्पष्ट रूप से पुष्टि के लिए विस्तृत एथनोग्राफिकल अध्ययन की आवश्यकता है।

शिकारी घुड़सवार या फिर घुड़सवार सेना का एक दृश्य।
गुफाओं में पेंटिंग जिसमें एक आदमी का सींग वाले एक दैवीय पशु (बायसन या सूअर) द्वारा शिकार करते दिखाया गया है

आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने भीमबेटका के क्लस्टर III सी के मध्यपाषाण कालीय (Mesolithic Period) एक शैल चित्र में राइनो पशु अर्थात गैंडे की पहचान ही है। इसका मतलब है कि यह भूभाग गैंडों का प्राकृतिक आवास था। फिलवक्त भारत में गैंडे दलदली घास के मैदान में मिलते हैं जैसे नेपाल तराई और असम के दलदली मैदान। इससे यह तथ्य सामने आता है कि भीमबेटका के आसपास दलदली घास के मैदान रहा होगा। फिर कालांतर में तेजी से जलवायु परिवर्तन होने से दलदली भूमि समाप्त हो गई। साथ ही गैंडा इस भूभाग से लुप्त हो गया। संभवतया उस दौर में हुये जलवायु परिवर्तन का असर भीमबेटका के कोर इलाके में रह रहे आदिमानवों के दैनिक जीवन के क्रियाकलापों पर पड़ा होगा। बढ़ती जनसंख्या के लिए भोजन व पानी के अवसर सीमित होते गए, वे नीचे मैदानों में बसते गए और फिर खेती व पशुपालन की शुरुआत हुई व इसकी पुष्टि बाद के दौर में चित्रित चित्रों से होती है।

हथियारों बंद घुड़सवारों का एक समूह।
बायें मध्य में मानव की हथेली।

उरोक्त बातों से इतना तो स्पष्ट है कि भीमबेटका, विश्व में मानव जीवन के शुरुआती विकास के इतिहास का अहम पड़ाव था। साथ ही यह भारत में मानव जीवन के आरंभिक काल का भी केन्द्रीय स्थल भी है जो विश्व के अन्य प्राचीन स्थलों से हजारों वर्ष पहले था। इसकी महत्वता को स्वीकारते हुये यूनेस्को द्वारा 2003 में भीमबेटका रॉक शेल्टर्स को विश्व धरोहर स्थल सूची में शामिल किया गया।

तत्कालीन प्राकृतिक आवास का चित्रण।
कछुए के आकार की चट्टान ।
हाथी पर सवार मानव और पीछे से आ रहा एक अन्य हाथी।
जन्तु शैलाश्रय में सौ से ज्यादा पशुओं के चित्रा है।

आज अतीत की इस खिड़की में झाँकने के लिए हर वर्ष हजारों की संख्या में पर्यटक यहाँ आते है। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण(एएसआई) ने खूबसूरती के साथ इसका संरक्षण किया है।

चित्रों को बनाने में गेरूये , सफ़ेद और लाल रंगों का प्रयोग बहुतायत में हुआ है, कहीं कहीं पीले और हरे रंगों भी देखने को मिलता है।
बरगद के पेड़ों ने चट्टानों के चीरकर खुद को स्थापित कर लिया है।
ऑडिटोरियम रॉक शेल्टर।
भीमबेटका के नृतक समूह में नाचते हुये
ASI द्वारा भीमबेटका के मानवीय जीवन को दर्शाते हुये बनाया एक काल्पनिक दृश्य। इस जगह की गए उत्खनन से 1 लाख वर्ष पहले मानवीय गतिविधियों की जानकारी मिलती है।

यह स्थान भोपाल-होशंगाबाद मार्ग पर अबदुल्लागंज के समीप है, मुख्यमार्ग से 3 किमी दूर है। भोपाल से इसकी दूरी 45 किमी है। गर्मी के महीनों में तापमान ज्यादा होता है। अगस्त से फरवरी तक घूमने का उपयुक्त मौसम रहता है।

भोपाल से भीमबेटका

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